प्रकृति व तानाशाह इंसान

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज

विनीता सोनी , जयपुर (राजस्थान)

पृथ्वी – पृथ्वी की उत्पत्ति को लेकर अनेकों वैज्ञानिक अवधारणाएं हैं, सहस्रों संभागीय किवदंतियाँ हैं और कुछ आध्यात्मिक प्रमाण भी है| सभी अपने मतों में भिन्न हैं| परंतु प्रकृति (अर्थात् हमारा जैविक संसार) की रचना को लेकर कोई मतभेद नहीं है| आध्यात्म, विज्ञान और लोकमत- सभी के सम्मिलित मत के अनुसार पृथ्वी की रचना के कुछ क्षणों (प्राकृतिक क्षणों) बाद ही प्रकृति का प्राकट्य हुआ| वही प्रकृति जो पंचतत्वों के अस्तित्व का मूलभूत कारण व रहस्य है| आकाश, जल, भूमि, वायु व अग्नि की दात्री है| और इस जैविक संसार की सर्वोच्चत्तम व अद्भुत संरचना है – मानव यानि की मनुष्य|

परंतु काल की गति इतनी सरलता से नहीं पार की जा सकती, समय के साथ ही यह मानव अपने-आप को कुछ माया, आराम व भोगिक संसाधनों के अधीन कर स्वयं को अपनी जीवनदायिनी प्रकृति का महानत्तम शत्रु बना बैठा| कुछ क्षणिक भोगों के लिए पृथ्वी का दमन करने लगा| उसका शोषण करने लगा| जंगल के जंगल अपने स्वार्थ रूपी दावानल से भस्म कर डालें| लोहे व कंक्रीट के वन बना खड़े किए| जहां कभी दूर-दूर तक निर्जन वनों का आधिपत्य – साम्राज्य हुआ करता था, वहां आज इंसानों की भीड़ कंक्रीट-पत्थर के जाल बुनकर निवास करने लगी| पर कहा जाता है – जिस प्रकार थोड़ा सुख और अधिक सुख पाने की लालसा को तीव्र कर देता है, उसी प्रकार स्वार्थ रूपी दावानली दानव बढ़ता ही गया|

फिर इंसान ने अपने मस्तिष्क का शोषण शुरू कर ऐसे हजारों आधुनिक अविष्कार रच डाले, जो मानव के लिए तो सुख व सरलता का पर्याय थे, पर प्रकृति के लिए साक्षात् भक्षकासूर बन गए| प्रकृति का संतुलन डगमगाने लगा! ईश्वर के संपूर्ण उचित अनुपातों को ये मानवीय ताड़का क्षणभंगुर करती गई| धरती पर विषैली गैसों तथा हानिकारक अमिट पदार्थों रूपी सुरसा अपना मुख बढ़ाती ही गई| और हाहाकार मच उठा| पृथ्वी का सिंहासन भी डोल उठा| उसकी श्रेष्ठत्तम ताकत “ओजोन परत” भी अपनी कवचीय शक्तियों से क्षीण होने लगी| सूर्य की पराबैंगनी किरणें यह कवच भेद पृथ्वी के सीने को दीमक की तरह खोखला करने लगी| मौसम, जनजाति तथा जीवन आदि सभी वीर अपना वैभव क्षीण होता देखते रहे| लेकिन कहते हैं ना- “अति सर्वत्र वर्जयते” और इसका हिसाब करती है- नियति अर्थात् कालचक्र |

फिर कालचक्र ने घटनाक्रम में एक ऐसा चक्र चलाया कि- सम्पूर्ण दुनिया में त्राहि-त्राहि की ध्वनियां गूंजने लगी| “कोरोना” रूपी सूर्पनखा सभी का भाग्य निगलने लगी| जिसके परिणाम स्वरुप यह अहंकारी मानव घर में ही बंदी बन जाने पर मजबूर हो गया और यही हमारी प्रकृति के भाग्य को वरदान-स्वरूप भेंट प्राप्त हुई| अचानक मानव के सभी आविष्कार बेमूल हो गए| बड़े-बड़े कल-कारखाने घने वनों के समान निर्जन हो गए, वाहन आदि का अस्तित्व भी संकटपूर्ण अनुभूति के बीच झूलता रह गया| आज का दृश्य यही है| ये वरदान मुरझाई प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार कर गया| नदियां कई मीलों तक निर्मल हो गयी, वर्षा खुलकर ठहाके लगाने लगी, खेत-खलिहान सब लहलहा उठे तथा हमारा कवच (ओजोन परत) स्वतः ही उपचारित होने लगा| आज की स्थिति हमे हमारी प्राकृतिक स्वच्छता के संदर्भ में कई सालों को पूर्व अपनी निर्मलता की और लाकर खड़ा कर चुकी है|

माना कि- हमारी यह स्थिति हमारे आधुनिक मानव जीवन को भी हताहत कर रही है, हमें जैविक व आर्थिक क्षतियाँ पहुंचा रही हैं| पर प्रकृति फिर मुस्कुराने लगी है, वो फिर चहचहाने लगी है, आयुष्मान हो उठी है| यही नयी स्फूर्तिपूर्ण ताज़गी व चहचहाट हमारे उज्जवल भविष्य व लाभदायी-निर्मल मानवीय क्रांति के द्वार खोल रही है, नया दौर रच रही है, नया युग बना रही है| ऑनलाइन क्रांति का युग| हमे इस संकटपूर्ण घडी में भी अपने क्षणिक दुःखों को नज़रअंदाज़ कर प्रकृति के इस सकारात्मक परिवर्तन का जश्न मनाना चाहिए। इसके आजीवन सुखों को देखकर खुश होना चाहिए। पतझड़ के बाद बसंत कि नयी कोपलों के समान धैर्यवान रहकर नए युग का स्वागत कर इसे आत्मसात करना चाहिए।

एक तानाशाही इंसान बनकर प्रकृति का शोषण करने की बजाय, एक आदर्श राजा व संतान की भाँति अभयदान दे, हमें संसार की रक्षा का बेड़ा उठाना चाहिए।

कह सकते है कि-

जब अँधा हो स्वार्थ में, बना तानाशाही इंसान,

रूप बना बेडोल सुरसा, निगलने लगी पृथ्वी के प्राण |

फिर आया कोरोना, बनकर एक सुखी-वरदान,

तुम भी अब उठो! जागो, और दो प्रकृति को अभयदान ||

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